
देव बूढ़ा बनोगी

देव बूढ़ा बनोगी का मेला: (16 वीं शताब्दी मे राजा सिद्धसेन ने देव बूढ़ा बनोगी का मंदिर बनाया था।)
मण्डी जिला में सैकड़ों देवी-देवता हैं जिनके अपने-अपने मेले होते हैं। इसी तरह का है देव बढ़ा बनोगी का मेला देव बुढा बनोगी के मन्दिर में वर्ष में दो मेलों का आयोजन किया जाता है। एक मेला ज्येष्ठ माह की प्रथम तिथि को तथा दूसरा मेला पंच भिखमी पुण्या को मनाया जाता है। इस देवता की अपनी ही प्रथा है जो प्राचीन समय से चली आ रही है। इस देवता के क्षेत्र के गांव के लोग जब सूखा पड़ता है व वर्षा ज्यादा होती है तो लोग देवता से मन्नत मांगते हैं। देवता कभी भी लोगों को निराश नहीं करता है और उनकी मंन्त्रत पूरी करता है। देवता के अपने क्षेत्र में किसी के घर में शादी हो या कोई शुभ कार्य हो तो पहले देवता को निमंत्रण दिया जाता है उसके बाद दूसरे लोगों को। शादी के बाद देवता के मन्दिर में जातर दी जाती है, जो नये नवेले दूल्हा व दुल्हन के लिए शुभ मानी गई है।
देव बूढ़ा बनोगी का मन्दिर मण्डी जिला के मुख्यालय से 16 कि.मी. दूर गांव सेहली के मध्य में स्थित है। मन्दिर के चारों तरफ गांव है। मन्दिर के आस-पास देव बूढ़ा बनोगी की अपनी जमीन है। मन्दिर के सामने एक छोटा ग्राऊंड है। जहां पर जोगनियों का पादका है। देवता के मन्दिर के सामने शिवजी का एक मन्दिर भी है। मन्दिर के चारों तरफ बहुत बड़े-बड़े पेड़ हैं। अब देवता का नया मन्दिर बना है। एक किवदन्ती के अनुसार देव बूढ़ा बनोगी का प्राचीन मन्दिर मण्डी रियासत के राजा सिद्धसेन ने बनाया था। सिद्धसेन मण्डी के इतिहास में अपने राज्य के विस्तार एवं अनेक मंदिरों वमूर्तियों के निर्माण के लिए ख्यात रहे।
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| देव बूढ़ा बनोगी |
वैसाख माह की अन्तिम तिथि को देव बढ़ा बनोगी की करंडी (मोहरा ) रात 12 बजे माता बगला मुखी के मन्दिर से अपने मन्दिर को जाती है। माता बगलामुखी के मन्दिर में भी देव बढ़ा बनोगी का अपना स्थान है। देवता की हार के सभी लोग इसमें सम्मिलित होते हैं। बाजे-गाजे के साथ देवता सबसे पहले अपने भण्डार में जाता है। जहां उसकी पूजा होती है। उसके बाद अपने मन्दिर में प्रवेश करता है। जब देवता की करंडी (मोहरा) अपने मन्दिर में प्रवेश कर लेती है तो फिर देवता का गुर खेलता है जिसमें लगभग सभी देवी-देवताओं के नाम बरसाऊली में लिए जाते हैं। गर की खेल समाप्त होने के बाद सारी रात मन्दिर में कीर्तन होता है।
अगली सुबह ज्येष्ठ की प्रथम तिथि को देव का मेला बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। सभी अमीर-गरीब, छोटे बड़े इस मेले में भाग लेते हैं। देवता के कारदारों का इन मेला में शामिल होना जरूरी होता है। मेले में दुकानों का प्रावधान भी होता है। इन मेलों में ज्यादातर लोग मिटाईयां खरीदते हैं। सारा दिन लोग मेले में आते-जाते रहते हैं तथा देवता के दर्शन करते हैं। देवता को अपनी फसल गेहूं की कणे भी चढ़ाते हैं। सायं चार बजे देव बूढ़ा बनोगी का गुर खेलता है तथा लोगों को स्थिति के बारे में अवगत करवाता है। उसके बाद ग्राऊंड में जोगनियों के पादके के पास बकरे की बलि दी जाती है। यह बलि हर वर्ष दी जाती है। कहा जाता है कि यह बलि जोगनियों को दी जाती है। यह प्रथा अभी तक जारी है। शाम को देव बूढ़ा बनोगी की करंडी (मोहरा) फिर अपने स्थान पर वापस चली जाती है, जहां से आई थी।
एक मेला पंच भिष्मी पुण्या (कार्तिक मास ) को होता है।
पंच भिर मी पुण्या की रात को देव बूढ़ा बनोगी का मन्दिर पूरी तरह से सजा हुआ होता है। इस रात को लगभग 9 बजे देवता का गुर खेलता है और देवों के आगमन की जानकारी देता है। उसके बाद देवता बूढ़ा बनोगों के पास बांठडा का आयोजन किया जाता है। कहा जाता है कि बांठड़ा करने की प्रथा भी प्राचीन समय से चली आ रही है। सारी रात लोग देवता के मन्दिर में ही गुजारते हैं। दुकानें रात से ही लगनी आरम्भ हो जाती हैं। दूसरे दिन सुबह माता बगला मुखी व देव बुढ़ा बनोगी की करंडी सबसे पहले देव स्थल पर पहुंचती है। इसके बाद आस-पास के क्षेत्रों के देवी-देवता भी इस मेले में सम्मिलित होते हैं। सारा दिन मेले में देवी-देवताओं का मिलन चला रहता है। इस मेले में देवता के कुछ देअल भी खेलते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में छरनाट कहा जाता है। देव मिलन के बाद मेहमान देवी-देवता अपने-अपने स्थान में बैठ जाते हैं। उन्हें भेटे प्रदान की जाती है। दोपहर बाद सभी देवी-देवताओं को भोग लगाया जाता है तथा देअलू भी धाम का आनन्द उठाते हैं। शाम को मेले की समाप्ति पर सभी देव बूढ़ा बनोगी से मिलते हैं और उसके बाद अपने-अपने मन्दिरों की तरफ प्रस्थान करते हैं। इस मेले का अपने क्षेत्र में अपना अलग ही महत्व है।

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