माँ बगलामुखी मंदिर सेहली का इतिहास !

 

माँ बगलामुखी मंदिर सेहली का इतिहास !


🌼ॐ ह्लीं बगलामुखी दैव्ये नमः🌼



बगलामुखी देवी 

इनके कई स्वरूप हैं। कहते हैं कि देवी बगलामुखी, समुद्र के मध्य में स्थित मणिमय द्वीप में अमूल्य रत्नों से सुसज्जित सिंहासन पर विराजमान हैं। देवी त्रिनेत्रा हैं, मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करती है, पीले शारीरिक वर्ण युक्त है, देवी ने पीला वस्त्र तथा पीले फूलों की माला धारण की हुई है। देवी के अन्य आभूषण भी पीले रंग के ही हैं तथा अमूल्य रत्नों से जड़ित हैं। देवी, विशेषकर चंपा फूल, हल्दी की गांठ इत्यादि पीले रंग से सम्बंधित तत्वों की माला धारण करती हैं। यह रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं।
देवी देखने में मनोहर तथा मंद मुस्कान वाली हैं। एक युवती के जैसी शारीरिक गठन वाली देवी ने अपने बाएं हाथ से शत्रु या दैत्य के जिह्वा को पकड़ कर खींच रखा है तथा दाएं हाथ से गदा उठाए हुए हैं, जिससे शत्रु अत्यंत भयभीत हो रहा है। देवी के इस जिव्हा पकड़ने का तात्पर्य यह है कि देवी वाक् शक्ति देने और लेने के लिए पूजी जाती हैं। कई स्थानों में देवी ने मृत शरीर या शव को अपना आसन बना रखा है तथा शव पर ही आरूढ़ हैं तथा दैत्य या शत्रु की जिह्वा को पकड़ रखा हैं।

 


🌸ॐ ह्लीं बगलामुखी दैव्ये नमः🌸

          जय माँ बगलामुखी जी 

बगलामुखी सुरसुन्दरी, जगदम्बिका कात्यायिनी, हे सत्यरूपाँ धर्मेरूपा, अमर सौभाग्यदायिनी,

हे हेमसुता, शिवप्रिया, हे भावनी कुक्टेश्वरी, हे रक्षिणी वरदायनी, वृषवाहना विघ्नेश्वरी,

बहुविधि ना पूजन कर सकूं, करुणामई करुणा करे,

मुझमूढ़ को वातसल्य बस माँ, नित्यप्रति क्षमा करे,



 जय माँ बगलामुखी जी 

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